(I.C.B चीफ)
दूरदर्शन न्यूज़ 24/7
(विस्तार)
दो जिलों की सीमा पर घर स्थित होने नाते उनका जौनपुर के साथ ही सुल्तानपुर से भी बेहद लगाव रहा। बताया जाता है कि उनका घर जौनपुर जिले की सीमा में स्थित है लेकिन घर का द्वार सुल्तानपुर जिले में पड़ता है। 7 दिसम्बर 2002 को उनका निधन हुआ। पं श्रीपति मिश्र के तीन बेटे और एक बेटी है। जिनमे राकेश मिश्र 1989 से छह साल तक एमएलसी रहे, दूसरे बेटे आलोक उपनगर आयुक्त पद से सेवानिवृत्त हुए, तीसरे बेटे प्रमोद मिश्र भी विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन उन्हें सफलता नही मिली। हालांकि जौनपुर - सुल्तानपुर जिले की सीमा पर स्थित पं श्रीपति मिश्र महाविद्यालय में आज उनकी बीसवीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है।
जनसेवा के लिए जज की नौकरी से दिया था इस्तीफ़ा
पूर्व मुख्यमंत्री पं श्रीपति मिश्र की ये तस्वीर देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ है।
पूर्व मुख्यमंत्री पं श्रीपति मिश्र वर्ष 1954 से 1958 में फर्रुखाबाद की जिला अदालत में जूनियर जज थे। उन्होंने जनसेवा के जुनून में इस्तीफा दे दिया था। जिला जज के काफी समझाने के बाद बावजूद जूनियर जज रहे पं श्रीपति मिश्र अपने फैसले पर अड़े रहे। जिसके बाद राजभवन से उनका इस्तीफ़ा मंजूर हुआ, उन्होंने जज की नौकरी छोड़ दी।पंचायत चुनाव लड़कर पहली बार बने थे प्रधान
पं श्रीपति मिश्र के परिवारिक रिस्तेदार व वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुरेंद्र त्रिपाठी दैनिक भास्कर से बताते हैं कि पं श्रीपति मिश्र जूनियर जज की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद जब घर गए तो उस दौरान पंचायत चुनाव था। उन्होंने पंचायत चुनाव में ताल ठोंक दी, पहले ही प्रयास में जनता ने उन्हें सेवा का अवसर देते हुए ग्राम प्रधान चुन लिया। उन्होंने प्रधानी के साथ - साथ सुल्तानपुर की अदालत से वकालत भी शुरू कर दी। कुछ बाद वह इलाहाबाद और लखनऊ उच्च न्यायालय में भी वकालत की। ग्राम प्रधान से मुख्यमंत्री बनने का सफर तय करने वाले पं श्रीपति मिश्र जूनियर जज की नौकरी से पहले भी विधानसभा चुनाव लड़ चुके थे।
शानदार रहा राजनीतिक सफर
पं श्रीपति मिश्र बेहद, सरल स्वभाव के थे। उनका राजनीतिक सफर शानदार रहा। वह हमेशा जमीन से जुड़े रहे जिसकी वजह से आज भी लोग उन्हें याद करते हैं। वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश के तीसरे विधानसभा चुनाव में वह सुल्तानपुर जिले की विधानसभा सीट से पहली बार विधायक बने। वर्ष 1967 में सुल्तानपुर की जनता ने दोबारा इसी विधानसभा से उन्हें विधायक चुना। इसके बाद 1967 से 1968 तक वह उत्तर प्रदेश विधानसभा का उपाध्यक्ष भी रहे। 1968 में कांग्रेस ने उन्हें पहली बार सुल्तानपुर से लोकसभा प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारा जिसमे जनता ने उन्हें अपना सांसद चुना था।
बताया जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह ने उन्हें इस्तीफा दिलाकर अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया था। 18 फरवरी 1970 से 1 अक्टूबर 1970 तक चौधरी चरण सिंह की सरकार में वह मंत्री भी रहे, उनकी ईमानदारी के कारण उन्हें कई महत्वपूर्ण विभाग दिए गए थे। हालांकि, 18 अक्टूबर 1970 से 4 अप्रैल 1971 तक त्रिभुवन नारायण सिंह की सरकार में शिक्षा एवं प्राविधिक शिक्षा मंत्री रहे। पं श्री पति मिश्र 1970 से 1976 तक एमएलसी रहे। उन्हें 1976 में राज्य योजना आयोग का अध्यक्ष भी बनाया गया। जून 1980 में उन्हें फिर से उत्तर प्रदेश की आठवीं विधानसभा का सदस्य बनाया गया।
इंदिरा गांधी ने बनाया था मुख्यमंत्री
पं श्रीपति मिश्र को इंदिरा गांधी ने उसवक्त मुख्यमंत्री बनाया था जब यूपी में डकैतों का आतंक चरम पर था। 1982 में डकैतों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने पर वीपी सिंह के भाई की हत्या कर दी गयी थी। जिसके बाद वीपी सिंह ने खुद इस्तीफा दे दिया। उस वक्त स्थिति को संभालने के लिए कांग्रेस को साफ-सुथरी छवि के साथ ही अनुभवी चेहरे की जरूरत थी।
इन्दिरा गांधी ने पं श्रीपति मिश्र को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया। बताया जाता है कि संजय गांधी से पं श्रीपति मिश्र के अच्छे संबंध थे। वीपी सिंह के इस्तीफे के बाद पं श्रीपति मिश्र को मुख्यमंत्री बनाया गया। वह 19 जुलाई 1982 से 2 अगस्त 1984 तक यूपी के तेरहवें मुख्यमंत्री रहे। हालांकि बाद में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था।
मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद जौनपुर से लड़े लोकसभा चुनाव
पं श्रीपति मिश्र पर जनसेवा का जुनूर इस कदर सवार था कि वह मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद कांग्रेस के टिकट पर जौनपुर की मछली शहर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे। 1984 में जनता ने उन्हें सांसद चुनकर आठवी लोकसभा में सदस्य बनाकर भेजा। वर्ष 1989 के चुनाव में मछलीशहर लोकसभा सीट पर उन्हें जनता दल के शिवशरण शर्मा से हार का सामना करना पड़ा।

